Saturday, 14 September 2024

कृष्ण से विनती

मुझे ब्रज की कान्हा रज बना दो,
जिसमे तुमने गैया चराई,

वहाँ के वृक्षों के पुष्प बना दो,
जिसकी गोपियों ने माला पिरोई,

यमुना का मुझे नीर बना दो,
जो पाकर तुम्हे पवित्र कहलायी,

मुझे ब्रज की हवा बना दो,
जिसको तुमने मुरली सुनाई,

हे माधव! मुझको गोपी बना दो,
जो छिड़ कर भी इतिरायी,

मुझे तुम माखन मिश्र बना दो,
जिसे खाने तुमने मटकी तुड़वाई,

मुझे तुम अपनी प्रिय गैया बना दो,
जो देख तुम्हे हर दिन हर्षायी,

मुझको गोविंद वो शिला बना दो,
तुमने कनिष्ठा पर जिसे उठाई,

राधा का मुझे हृदय बना दो,
जिसमे तुम्हारी श्रृष्टि समाई।

Wednesday, 4 September 2024

माँ कब अवतार लोगी

हे माँ! किस किस का तुम संहार करोगी?
घर घर में अब महिष बैठे है,
हर मन में असुर अब बसते हैं,
जो दिन–रात भक्षण करते है।

हे माँ! कैसे तुम्हारा सिंह धहाड़ेगा?
हर मुख पर तो ताले लगे है,
ये गुपचुप बातें तो करते है,
पर विरोध करने से डरते है।

हे माँ! कैसे तुम्हारे अब अस्त्र चलेंगे?
शक्ति अब दुष्टों के पास है,
पापियों का ही यहाँ राज है,
जो सबका दमन करते हैं।

हे माँ! क्या तुम फिर अवतार लोगी?
हर नारी में अब तुम अवतरित हो,
हर भुजा में तुम्हारी शक्ति हो,
और हर पापी का संहार हो।

Thursday, 22 August 2024

निर्भया

मोमबत्ती जलाने से क्या होगा,
क्या गुनेहगारों का खात्मा होगा?

कुछ देर में ये लोग घर चले जायेंगे,
कुछ दिनों में सब तुमको भूल जायेंगे,

ना कोई भी अत्याचारी डरा अभी तक,
ना कानून ने कोई सुध ली अभी तक,

बहुत जला ली हमने मोमबत्तियां,
इंसाफ को तरसती रही हर निर्भया,

कब तक रहेगी अबला हर नारी?
कब तक स्वतंत्र घूमेंगे अत्याचारी?

हाथ जोड़ने से कब राह आसान होती?
रोने धोने से कब मुश्किलें आसान होती?

जब ना रहा था कोई भी उपचार,
तब कृष्ण ने भी उठा लिए थे हथियार,

ओ नारी! थाम लो हाथों में अब कटार तुम,
माँ शक्ति हो! चंडी रूप अपनाओ तुम,

कोई जालिम अगर मिले कहीं पर,
देखना की शीश ना रहे उसके धड़ पर,

एक को मारोगी तो सौ का भला होगा,
एक हजार में साहस का संचार होगा,

तब ही अपराधी भी थर–थर कापेंगे,
हर अपराध से पहले हजार बार सोचेंगे।

फिर ना किसी नारी की आबरू लुटेगी 
फिर ना कोई बहन–बेटी निर्भया बनेगी।

Sunday, 12 September 2021

माँ

मातृ ममता की वेदी पर,
मैंने बचपन बीताया है,
माँ तुम्हारी गोद में,
जाने कितना स्नेह पाया है।।

मैं हूँ बस परछाही तुम्हारी,
मुझमे अंश तुम्हारा है,
खुश रहो माँ तुम सदा,
बस यही स्वर्ग हमारा है।।

माँ तुम हो अनमोल खज़ाना,
खर्च कभी न हो पाएगा,
प्यार तो है निःस्वार्थ तुम्हारा,
वो और कहाँ मिल पाएगा।।

जननी आज जब खुद बनी माँ,
वो प्यार तेरा समझ आया है,
अपनी ममता में तुम्हे ढूंढती,
तेरा आँचल याद फिर आया है।।

इस धरा की हर माँ सबल,
दुर्गा भवानी अतुलित बल
शत शत नमन हर माँ को मेरा,
त्याग की मूरत ये हर पल।।

मोती की माला

एक माला मेरी लाखो की,
लाखो का उसका हर मोती था,
हर मोती उसका एक लम्हा,
एक एक करके जिनको बुना था।

देखो वो माला मेरी टूट गयी,
और मोती सारे बिखर गये,
लम्हे सारे याद है अब भी,
पर अश्रु में सब धुंधला गये।

हर मोती को मैं फिर चुनु,
हर मोती को मैं फिर रखु,
धागा नही पर मेरे पास,
वो माला फिर मैं कैसे बुनु।

धागा था जो टूट गया,
लम्हा हर एक छूट गया,
बंधी गाँठ जो धागे में,
मोती फिर पिरोया न गया।

कैसे पिरोऊँ अपनी माला को,
कैसे संजोऊ उन लम्हो को,
वो माला नही मेरी अब,
जिसमे जिये हजारो लम्हो को।

एक माला मेरी लाखो की,
लाखो का उसका हर मोती था,
हर मोती उसका एक लम्हा,
एक एक करके जिनको बुना था।

मन पतंग

झर झर झर झर बह निकली,
मेरे अश्रु विषाद की धारा,
है मन उदास, ना कोई खास,
ना कोई आज मुझे प्यारा।

मन पतंग का तंग कटा,
डोर हाथ से छूट गयी,
पास के वीराने तने पर,
आज पतंग मेरी अटक गयी।

कोई खींचता है डोर कभी,
कोई लूटता मेरी पतंग कभी,
हर झटके से वो फट जाती,
पर हाथ किसी के ना आयी कभी।

जो फट गई, जो कट गयी,
मन पतंग कहीं उलझ गयी,
शोक मनाता दिल बार बार,
अश्रु से मेरी कमीज भीग गयी।

आज फिर उठता प्रश्न यह,
कितना शोक मनाऊ मैं?
एक पतंग के कट जाने से,
क्या फिर पतंग न उड़ाऊ मैं?

एक और पतंग ली हाथ में,
बांध दी तंग कस कर इस बार,
हवा के संग बह उड़ी वो,
छू लिया गगन को इस बार।

कट जाए या उड़ जाए,
ना शोक है ना लोभ मुझे अब,
कोई कितना भी जोर लगाए
ना मन पतंग कटने का डर अब।

झर झर झर झर बह निकली,
मेरे अश्रु विषाद की धारा,
है मन उदास, ना कोई खास,
ना कोई आज मुझे प्यारा।

एक बार फिर चलो तुम मधुशाला

सबके हाथो में हो मधु का प्याला,
न कोरोना का डर हो न कोई वहाँ रोने वाला,
कोई हमे कुछ कहे, कोई हमारी सुनने वाला।।
एक बार फिर चलो तुम मधुशाला।।

हर चेहरे पर मुस्कान बिछी हो,
हर घूट पी कर , लबो पर कोई गीत छिड़ा हो,
दोस्तों के साथ जमी हो महफ़िल हाला,
एक बार फिर चलो तुम मधुशाला।।

दीन हीन या हो धनवान, कोई फर्क नही करती ये शाला,
न भेद कोई भी करता है, इसके रस को पीने वाला,
कीमत न पूछ इसकी, बहुमूल्य है ये पावन हाला,
एक बार फिर चलो तुम मधुशाला।।

अंतिम बार समझ कर, हर रोज आते है इसके दर पर,
सब कुछ लुटा देने को तत्पर, रहता मधु को पीने वाला,
जीने की चाह में शायद लूट रहा है योवन हाला,
एक बार फिर चलो तुम मधुशाला।।

कृष्ण से विनती

मुझे ब्रज की कान्हा रज बना दो, जिसमे तुमने गैया चराई, वहाँ के वृक्षों के पुष्प बना दो, जिसकी गोपियों ने माला पिरोई, यमुना का मुझे नीर बना दो...