क्या गुनेहगारों का खात्मा होगा?
कुछ देर में ये लोग घर चले जायेंगे,
कुछ दिनों में सब तुमको भूल जायेंगे,
ना कोई भी अत्याचारी डरा अभी तक,
ना कानून ने कोई सुध ली अभी तक,
बहुत जला ली हमने मोमबत्तियां,
इंसाफ को तरसती रही हर निर्भया,
कब तक रहेगी अबला हर नारी?
कब तक स्वतंत्र घूमेंगे अत्याचारी?
हाथ जोड़ने से कब राह आसान होती?
रोने धोने से कब मुश्किलें आसान होती?
जब ना रहा था कोई भी उपचार,
तब कृष्ण ने भी उठा लिए थे हथियार,
ओ नारी! थाम लो हाथों में अब कटार तुम,
माँ शक्ति हो! चंडी रूप अपनाओ तुम,
कोई जालिम अगर मिले कहीं पर,
देखना की शीश ना रहे उसके धड़ पर,
एक को मारोगी तो सौ का भला होगा,
एक हजार में साहस का संचार होगा,
तब ही अपराधी भी थर–थर कापेंगे,
हर अपराध से पहले हजार बार सोचेंगे।
फिर ना किसी नारी की आबरू लुटेगी
फिर ना कोई बहन–बेटी निर्भया बनेगी।