Saturday, 14 September 2024

कृष्ण से विनती

मुझे ब्रज की कान्हा रज बना दो,
जिसमे तुमने गैया चराई,

वहाँ के वृक्षों के पुष्प बना दो,
जिसकी गोपियों ने माला पिरोई,

यमुना का मुझे नीर बना दो,
जो पाकर तुम्हे पवित्र कहलायी,

मुझे ब्रज की हवा बना दो,
जिसको तुमने मुरली सुनाई,

हे माधव! मुझको गोपी बना दो,
जो छिड़ कर भी इतिरायी,

मुझे तुम माखन मिश्र बना दो,
जिसे खाने तुमने मटकी तुड़वाई,

मुझे तुम अपनी प्रिय गैया बना दो,
जो देख तुम्हे हर दिन हर्षायी,

मुझको गोविंद वो शिला बना दो,
तुमने कनिष्ठा पर जिसे उठाई,

राधा का मुझे हृदय बना दो,
जिसमे तुम्हारी श्रृष्टि समाई।

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कृष्ण से विनती

मुझे ब्रज की कान्हा रज बना दो, जिसमे तुमने गैया चराई, वहाँ के वृक्षों के पुष्प बना दो, जिसकी गोपियों ने माला पिरोई, यमुना का मुझे नीर बना दो...