झर झर झर झर बह निकली,
मेरे अश्रु विषाद की धारा,
है मन उदास, ना कोई खास,
ना कोई आज मुझे प्यारा।
मन पतंग का तंग कटा,
डोर हाथ से छूट गयी,
पास के वीराने तने पर,
आज पतंग मेरी अटक गयी।
कोई खींचता है डोर कभी,
कोई लूटता मेरी पतंग कभी,
हर झटके से वो फट जाती,
पर हाथ किसी के ना आयी कभी।
जो फट गई, जो कट गयी,
मन पतंग कहीं उलझ गयी,
शोक मनाता दिल बार बार,
अश्रु से मेरी कमीज भीग गयी।
आज फिर उठता प्रश्न यह,
कितना शोक मनाऊ मैं?
एक पतंग के कट जाने से,
क्या फिर पतंग न उड़ाऊ मैं?
एक और पतंग ली हाथ में,
बांध दी तंग कस कर इस बार,
हवा के संग बह उड़ी वो,
छू लिया गगन को इस बार।
कट जाए या उड़ जाए,
ना शोक है ना लोभ मुझे अब,
कोई कितना भी जोर लगाए
ना मन पतंग कटने का डर अब।
झर झर झर झर बह निकली,
मेरे अश्रु विषाद की धारा,
है मन उदास, ना कोई खास,
ना कोई आज मुझे प्यारा।
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