एक माला मेरी लाखो की,
लाखो का उसका हर मोती था,
हर मोती उसका एक लम्हा,
एक एक करके जिनको बुना था।
देखो वो माला मेरी टूट गयी,
और मोती सारे बिखर गये,
लम्हे सारे याद है अब भी,
पर अश्रु में सब धुंधला गये।
हर मोती को मैं फिर चुनु,
हर मोती को मैं फिर रखु,
धागा नही पर मेरे पास,
वो माला फिर मैं कैसे बुनु।
धागा था जो टूट गया,
लम्हा हर एक छूट गया,
बंधी गाँठ जो धागे में,
मोती फिर पिरोया न गया।
कैसे पिरोऊँ अपनी माला को,
कैसे संजोऊ उन लम्हो को,
वो माला नही मेरी अब,
जिसमे जिये हजारो लम्हो को।
एक माला मेरी लाखो की,
लाखो का उसका हर मोती था,
हर मोती उसका एक लम्हा,
एक एक करके जिनको बुना था।
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