ज़िन्दगी की दौड़ में,
बचपन कहीं गुम गया,
जवानी का जोश भी,
समय के साथ सो गया।।
जवानी का भी बाजार लगा,
हर किसी की यहाँ बोली लगी,
हम में भी कुछ हुनर था शायद,
पर अपना मोल पता न लगा।।
अनुभवो का दायरा बढ़ता रहा,
ख्वाहिशे मेरी बदलती रही,
हर चीज पाने की चाह में,
खुशियाँ मेरी जाती रही।।
अनगिनत नौकाएँ नदी में जैसे
बहती रहे बहाव के संग,
किनारे की खोज है सबको,
नाविक मगर किसी बिरले के संग।।
छोड़ कर तू इस बाजार को,
नाविक अपना ढूंढ ले,
दौलत, शौहरत से खुशी नहीं,
खुशी है सिर्फ हरि नाम में।।
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