मुझे वो ना मिला जिसका मैं हकदार था,
इस्तेमाल करके बहुतों ने मुझे छोड़ा है,
है कुदरत का नियम यही मेरे दोस्त,
अपने हक के लिए तो लड़ना पड़ता है।।
काटों पर चलकर राह हमने तय की थी मगर,
फूलों का बिछौना कभी नसीब न हुआ,
नजरें जरूर थी हमारी मंजिल पर मगर,
यूहीं कोई पीठ पर खंजर मार कर चला गया।।
दर्द बहुत दिया है अपनो ने मगर,
हर दर्द की दवा भी कोई अपना ही है,
एक दरवाजा बंद हुआ जो तक़दीर का,
देख मालिक ने कितने ताले खोल दिये है।।
अब फिर अपने इरादे तू बुलंद कर,
जी जान लगा, खून पसीना तू एक कर,
हक तेरा है तेरी मंजिल पर, दिखा दे सभी को,
रोक न पाए कोई तुझे, वो मुकाम तू हासिल कर।।
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